फिराक साहब
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: फिराक गोरखपुरी | Posted On 22-12-10 at 7:35 am
छ्लक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं
निगाहे-नरगिसे-राना, तेरा जवाब नहीं
ज़मीन जाग रही है कि इन्क़लाब है कल
वो रात है कि कोई ज़र्रा भी महवे-ख़्वाब नहीं
ज़मीन उसकी, फ़लक उसका, कायनात उसकी
कुछ ऐसा इश्क़ तेरा ख़ानमा ख़राब नहीं
जो तेरे दर्द से महरूम हैं यहाँ उनको
ग़मे- ज़हाँ भी सुना है कि दस्तयाब नहीं
अभी कुछ और हो इन्सान का लहू पानी
अभी हयात के चेहरे पे आबो-ताब नहीं
दिखा तो देती है बेहतर हयात के सपने
ख़राब हो के भी ये ज़िन्दगी ख़राब नहीं
निगाहे-नरगिसे-राना, तेरा जवाब नहीं
ज़मीन जाग रही है कि इन्क़लाब है कल
वो रात है कि कोई ज़र्रा भी महवे-ख़्वाब नहीं
ज़मीन उसकी, फ़लक उसका, कायनात उसकी
कुछ ऐसा इश्क़ तेरा ख़ानमा ख़राब नहीं
जो तेरे दर्द से महरूम हैं यहाँ उनको
ग़मे- ज़हाँ भी सुना है कि दस्तयाब नहीं
अभी कुछ और हो इन्सान का लहू पानी
अभी हयात के चेहरे पे आबो-ताब नहीं
दिखा तो देती है बेहतर हयात के सपने
ख़राब हो के भी ये ज़िन्दगी ख़राब नहीं


ज़मीन जाग रही है कि इन्क़लाब है कल
वो रात है कि कोई ज़र्रा भी महवे-ख़्वाब नहीं
FIRAQ SAAB KO PADHWANE KE LIYE SHUKARIYAA
अभी कुछ और हो इन्सान का लहू पानी
अभी हयात के चेहरे पे आबो-ताब नहीं
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व्यंग्य उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
दिखा तो देती है बेहतर हयात के सपने
ख़राब हो के भी ये ज़िन्दगी ख़राब नहीं
..sach jindagi ko jaisa samjh liya jaata hai waisi hoti nahi.. bahut kuch apne par nirbhar rahta hai..
sundar prastuti..
.
नमन है आपको , जो इतने श्रम के साथ अच्छी रचनाएं पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रयास करते हैं ।
प्रस्तुत ग़ज़ल सहित कुछ प्रविष्टियां पढ़ कर मुझे प्रसन्नता हुई ।
आभार और मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार
बहुत ही बढिया
कल 18/04/2012 को आपके इस ब्लॉग को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.
आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!
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