एकांत श्रीवास्तव की दो कवितायें
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: एकांत श्रीवास्तव, कविता | Posted On 23-7-10 at 10:14 pm
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| यहां पढ़ें कवि और कविता पर एकांत श्रीवास्तव का वक्तव्य |
अनाम चिड़िया के नाम
गंगा इमली की पत्तियों में छुपकर
एक चिड़िया मुँह अँधेरे
बोलती है बहुत मीठी आवाज़ में
न जाने क्या
न जाने किससे
और बरसता है पानी
आधी नींद में खाट-बिस्तर समेटकर
घरों के भीतर भागते हैं लोग
कुछ झुँझलाए, कुछ प्रसन्न
घटाटोप अंधकार में चमकती है बिजली
मूसलधार बरसता है पानी
सजल हो जाती हैं खेत
तृप्त हो जाती हैं पुरखों की आत्माएँ
टूटने से बच जाता है मन का मेरुदंड
कहती है मंगतिन
इसी चिड़िया का आवाज़ से
आते हैं मेघ
सुदूर समुद्रों से उठकर
ओ चिड़िया
तुम बोले बारम्बार गाँव में
घर में, घाट में, वन में
पत्थर हो चुके आदमी के मन में ।
एक चिड़िया मुँह अँधेरे
बोलती है बहुत मीठी आवाज़ में
न जाने क्या
न जाने किससे
और बरसता है पानी
आधी नींद में खाट-बिस्तर समेटकर
घरों के भीतर भागते हैं लोग
कुछ झुँझलाए, कुछ प्रसन्न
घटाटोप अंधकार में चमकती है बिजली
मूसलधार बरसता है पानी
सजल हो जाती हैं खेत
तृप्त हो जाती हैं पुरखों की आत्माएँ
टूटने से बच जाता है मन का मेरुदंड
कहती है मंगतिन
इसी चिड़िया का आवाज़ से
आते हैं मेघ
सुदूर समुद्रों से उठकर
ओ चिड़िया
तुम बोले बारम्बार गाँव में
घर में, घाट में, वन में
पत्थर हो चुके आदमी के मन में ।
दु:ख
दु:ख जब तक हृदय में था
था बर्फ़ की तरह
पिघला तो उमड़ा आँसू बनकर
गिरा तो जल की तरह मिट्टी में
रिस गया भीतर बीज तक
बीज से फूल तक
यह जो फूल खिला है टहनी पर
इसे देखकर क्या तुम कह सकते हो
कि इसके जन्म का कारण
एक दु:ख था?
था बर्फ़ की तरह
पिघला तो उमड़ा आँसू बनकर
गिरा तो जल की तरह मिट्टी में
रिस गया भीतर बीज तक
बीज से फूल तक
यह जो फूल खिला है टहनी पर
इसे देखकर क्या तुम कह सकते हो
कि इसके जन्म का कारण
एक दु:ख था?



अच्छी विचारणीय कविता ,शानदार प्रस्तुती ...
एकांत जी की कविताओं में एक अलहदा राग गूंजता है...
बेहतर प्रस्तुति...
मंगलवार 27 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार
http://charchamanch.blogspot.com/
बेहतरीन कवितांए.
एकांत भाई और आपको धन्यवाद.
एकांत जी की रचनाएं बेहद गंभीर ... संवेदनशील हैं ... दुःख विशेष रूप से बहुत पसंद आई ...
पहली बार फूल को दुःख से लिपटा हुआ देखा है... एक कवि की ताकत का अंदाजा हुआ है..
dukh hi to jiwan ka mul hai sukh to ful ke saman samay se aata jata rahata hai lekin majedar bat yah hai ki sabhi ko sukh ki talash hai lekin wah kahan milata hai kisi ko nahi malum ?
arganikbhagyoday.blogspot.com
ओ चिड़िया
तुम बोले बारम्बार गाँव में
घर में, घाट में, वन में
पत्थर हो चुके आदमी के मन में ।
bahut badhiyaa kavita
samvedansheel rachnayen!
regards,
ekant bhai
mere pasandida kaviyon mein se hain...
maza aa gaya padhakar.