शहर में ग़रीब वाया शरद कोकास
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: कविता, शरद कोकास | Posted On 7-3-10 at 8:40 am
( शरद कोकास किसी परिचय के मुहताज नहीं - न साहित्य जगत में और न ब्लाग जगत में…अभी अर्थात पर मैने शहरी ग़रीबी पर एक आलेख लगाया तो प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने एक कविता लगायी। वह टिप्पणी में खो जाने वाली कविता नहीं है…तो उसे आप सब के लिये यहां प्रस्तुत कर रहा हूं)
लौट गया उलटे पाँव
जो डरते डरते शहर में बस गये
वे गाँवों से आये थे
मजबूरियाँ उन्हे खींच लाई थीं
वे गाँव साथ लेकर आये थे
शहर की बस्तियों ने
उन्हे बेदखल नहीं किया
सडकों ने मंज़िलों को नहीं किया गुम
टहलने से नहीं रोका बागीचों ने
बाज़ारों ने जेब नहीं काटी
खंज़र नहीं भोंका दोस्तों ने पीठ में
प्रेमिकाओं ने बेवफाई नहीं की
रिश्तेदारों ने लानतें नहीं भेजीं
मालिकों ने पेट पर लात नहीं मारी
नहीं उछाला नाम अखबारों ने
शहर ने पूरी पूरी कोशिश की शुरु शुरु में
उनके कन्धों पर हाथ रखने की
मगर उन्होने अन्धों को सडक पार करवाई
फैले हाथों पर
अपनी मेहनत का कुछ अंश रखा
बच्चों को दुलराया खिलौने दिये
पड़ोसियों से हाल पूछे
एक कटोरी सब्ज़ी उनके घर पहुँचाई
शहर फिर आया अपनी तमाम बुराइयाँ लिये
उन्हे निगल जाने को
उन्होने शहर के पाँव पखारे
न्योता दिया हमदर्दी जताई
गाँव-जवार की बातें कीं
देहरी से लौट गया शहर उल्टे पाँव



उन्हे निगल जाने को
उन्होने शहर के पाँव पखारे
न्योता दिया हमदर्दी जताई
गाँव-जवार की बातें कीं
देहरी से लौट गया शहर उल्टे पाँव
bahut khub likhaa hai
manik
मन को छू लिया
इस कविता ने
बहुत गंभीरता के साथ!
--
अशोक जी को धन्यवाद!
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शरद जी को बधाई!
bhai saheb, is kavita ki panktiyo ke baad kuchh kahne layak to mujhe nahi sujh raha.....
bas yahi kahna chahta hu ki jab dehari se shahar ulte paon laut jaye aur sach me laut jaye to fir ........ gar gram panchayat se lekar nagar palika tak ki galiyan concreet se bani na dikhe aur agar dikhe to fir ham is baat ka rona na royein ki bhoojal star aur niche jaa raha hai, kynki agar bhoojal star niche jaa raha hai to karan ham hi hain na, har gram panchayat se lekar nagar palika me har gali sadak concreet ki ban rahi hai to fir kaha se varshha jal sangrahan hoga bhaiya.. shayad mai galat jagah galat muddaa chher baitha, muaafi chahta hu. m realy sorry
nice
शहर की बस्तियों ने
उन्हे बेदखल नहीं किया
सडकों ने मंज़िलों को नहीं किया गुम
टहलने से नहीं रोका बागीचों ने
बाज़ारों ने जेब नहीं काटी
खंज़र नहीं भोंका दोस्तों ने पीठ में
प्रेमिकाओं ने बेवफाई नहीं की
रिश्तेदारों ने लानतें नहीं भेजीं
मालिकों ने पेट पर लात नहीं मारी
नहीं उछाला नाम अखबारों ने
शहर ने पूरी पूरी कोशिश की शुरु शुरु में
उनके कन्धों पर हाथ रखने की
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यही वह स्थिति तो है जहाँ से शहर गाँव से आयों को डसना शुरु करता है ... बचे तो ठीक अन्यथा आपकी बद्किस्मती ..
एक अच्छी कविता।
देहरी से लौट गया गया शहर उलटे पाँव ....
गाँव पर शहर की हार ...
बहुत सही