ख़्वाहिशों को सर उठाना आ गया
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: कुमार विनोद, ग़ज़ल | Posted On 10-1-10 at 10:39 pm
आधार प्रकाशन से मंगाने के लिए पर 09417267004 फोन कर सकते हैं और किताब की कीमत है १०० रुपये.
(डा कुमार विनोद को अरसे से देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता रहा। अरसा पहले उन्होंने कथन में छपी मेरी एक कविता पढ़ने के बाद जैसे-तैसे जुगाड़ करके उन्होंने मेरा नंबर हासिल किया.(उन दिनों कथन में नंबर नही दिया करते थे रमेश जी) फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। डा साहब अपनी ग़ज़लों की ही तरह मस्तमौले इंसान हैं। खूब बतियाने वाले और साफ़-साफ़ कहने वाले। ग़ज़लों के अलावा कवितायेँ भी लिखते हैं और व्यंग्यभी । एक कविता संकलन 'कविता ख़त्म नही होती'' २००७ में आ चुका है और अभी परसों उन्होंने बताया कि उनका पहला ग़ज़ल संग्रह आधार प्रकाशन से आया है। नाम है बेरंग हैं सब तितलियाँ। यहाँ उसका कवर देखिये और पढ़िए कुछ ग़ज़लें।)
(एक )
एक सम्मोहन लिए हर बात में
हर तरफ़ बैठे शिकारी घात में
एक सम्मोहन लिए हर बात में
हर तरफ़ बैठे शिकारी घात में
आने वाली नस्ल को हम दे चुके
दो जहाँ की मुश्किलें सौग़ात में
बादलों का स्वाद चखने हम चले
तानकर छाता भरी बरसात में
आप जिंदा हैं, ग़नीमत जानिए
कम नहीं ये आज के हालात में
जगमगाते इस शहर को क्या पता
फ़र्क़ भी होता है कुछ दिन-रात में
मोम की क़ीमत नहीं कुछ इन दिनों
छोड़िये, रक्खा है क्या जज़्बात में !
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(दो)
राग मज़हब का सुनाना आ गया
हुक्मराँ को गुल खिलाना आ गया
देखकर बाज़ार की क़ातिल अदा
ख़्वाहिशों को सर उठाना आ गया
सच को मिमियाता हुआ-सा देखकर
झूठ को आँखें दिखाना आ गया
ताश के पत्तों का है तो क्या हुआ
बेघरों को घर बनाना आ गया
कुछ भी कह देता मैं कल उस शोख़ से
बीच में रिश्ता पुराना आ गया
दूर खेतों में धुआँ था उठ रहा
और हम समझे ठिकाना आ गया
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सम्पर्क: 1705/2, वार्ड 8, विष्णु कॉलोनी, कुरुक्षेत्र - 136 118 (हरियाणा)
सम्प्रति: एसोसिएट प्रोफ़ेसर, गणित विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र-136 119, (हरियाणा)
फोन: 094161 37196, 01744 293670
ई मेल: vinodk_bhj@rediffmail.com
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आज के युग का कैसेला स्वाद बड़ी नजाकत से समेटे हुए हैं गजलें ..
स्वाद चख कर भूख बढ़ी है .. विनोदजी को ढेर सारीबधाई ...
Dusri ghazal waqai Qabil-e-dad hai. Sare sher achchhe haiN.
आधुनिक कविता के इस भागम-दौड़ में ग़ज़ल अकेली हाशिये पर खड़ी नजर आती है। अच्छा लगा देख कर कि कुछ लोग अभी भी जुटे हुये हैं इस ग़ज़ल नामक विधा का अस्तित्व कायम रखने में। वर्ना तो फ्री-वर्स का ये दौर बड़ा ही ज़ालिम होता जा रहा है...
कुमार विनोद साब को बधाई इन अच्छी ग़ज़लों के लिये और आपको शुक्रिया अशोक भाई "ग़ज़ल" की हौसलाअफ़जाई के लिये!
शायद विनोद साब को खुद मालूम नहीं हो, इसलिये सोचा कि उनको बताता चलूं कि ग़ज़ल-हलके में उनका ये शेर खूब लोकप्रियता पा चुका है:-
"देखकर बाज़ार की क़ातिल अदा
ख़्वाहिशों को सर उठाना आ गया"
सलाम विनोद जी इन अशआरों के लिये!
सच को मिमियाता हुआ-सा देखकर
झूठ को आँखें दिखाना आ गया
कुमार विनोद की गज़लें समाज की तमाम विसंगतियों को बखूबी व्यक्त करती हैं। और यही कारण है कि इन गज़लों को हाशिये पर रखा ही नहीं जा सकता। कुमार जी को बधाई तो सब देंगे किंतु हमें यह शुभकामना भी करनी चाहिये कि यह सृजनशीलता ता उम्र बनी रहे।
वाकई बेहद उम्दा गजलें हैं. शुक्रिया...