प्रभाष जी हिंदी के सबसे बड़े विचारहीन, कुतर्की, और रूढ़िग्रस्त लेखक थे
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: आलोक श्रीवास्तव | Posted On 11-11-09 at 7:19 am

(आलोक श्रीवास्तव कवि हैं, लेखक और पत्रकार। किसी विधा में लिख रहे हों लिखते हैं खरी-खरी। तो प्रभाष जोशी के अवसान के बाद चहुंओर मची आह-आह के बीच वह लिख ही डाला जो हम लिखने की सोच रहे थे…शब्द चाहे उनके हों भाव अपने भी हैं। चाहें तो पूछ ले उस रात हमारी बातचीत के बारे में)
प्रभाष जी हिंदी के शक्तिशाली और प्रमुख संपादक रहे। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्हें एक्सप्रेस समूह के मालिक का पूर्ण विश्वास प्राप्त था. वे उनके एक तरह के पुत्र या मानस पुत्र जैसे थे, ऐसा प्रभाष जी स्वयं ही कहते थे. शक्तिशाली इस अर्थ में कि उनके लिखे का व्यापक पाठक वर्ग और उसका हिंदी के पढ़े लिखे मध्यवर्ग पर थोड़ा बहुत ही सही पर असर था, जो कि विगत वर्षों में हिंदी के किसी भी संपादक का नहीं रहा. शक्तिशाली इस अर्थ में कि समाज के सत्ता शाली वर्ग, राजनेता, प्रशासक, राजनीतिक संगठनों तक उनकी पहुंच और उनका सम्मान था, और इसका उन्होंने कभी बेजा इस्तेमाल नहीं किया, शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्होंने कभी छृद्र निजी लाभों के लिए अपनी स्थिति को नहीं भुनाया. सचमुच हिंदी में पत्रकारिता की जो गत हो चुकी है और संपादकों का जो चरित्र और व्यक्तित्व है, उनमें प्रभाष जी का एक अलग आभामंडल था. उनके निधन पर मुझे शोक है, ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले दो दशकों में दिवंगत हुए हिंदी के अन्य संपादकों, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, गणेश मंत्री आदि के निधन पर हुआ था.
पर एक फर्क देख रहा हूं, उपरोक्त संपादकों में से कौन कद में और योगदान में प्रभाष जोशी से कमतर था? पर किसी का वैसा स्तुतिगान नहीं हुआ जैसा प्रभाष जी का हो रहा है. बल्कि ये लोग ठीक से समाचार भी नहीं बन पाए. मुझे लग रहा है कि यह गलत हो रहा है. प्रभाष जी की तमाम विशेषताओं को मैं स्वीकार करता हूं. परंतु सार्वजनिक व्यक्तित्वों का मूल्यांकन उन पैमानों पर नहीं किया जाता, जिन पर प्रभाष जी का किया जा रहा है. उनके मूल्यांकन का निकष उनके विचारों में अंतर्निहित तत्व और उनके कार्यों की दिशा ही होती है. मैंने प्रभाष जी पर आज नहीं आठ-नौ साल पहले कथादेश पत्रिका में अपने स्तंभ अखबारनामा में दो-तीन लेख लिखे थे. आज फिर से प्रभाष जी पर उन बहुत सी बातों को लिखने का मन है, जिनसे सत्य प्रकट हो. पर शायद इसमंे कुछ समय लगेगा. कोई भी शोक इतना बड़ा नहीं होता, कि उसकी छाया में सत्य को दबा दिया जाए. मेरा न तो प्रभाष जी से व्यक्तिगत संपर्क था, न कोई व्यक्तिगत अनुभव, न ही कोई व्यक्तिगत राग-द्वेष. मैं उन्हें, उनके सार्वजनिक वक्तव्यों, उनके काॅलम कागद कारे और उनके तमाम लेखन, भाषण और कार्यों को बहुत गौर से निरखता रहा हूं. आरंभ के लगभग दस वर्षों तक तो मैंने उनके काॅलम कागद कारे की एक एक किस्त गौर से पढ़ी है. उनकी संप्रेषण क्षमता पर मुग्ध हुआ उसे सराहा, पर उसकी अंतर्वस्तु और उसमें निहित विचारों में मुझे हमेशा क्षुब्ध किया. प्रभाष जी हिंदी के सबसे बड़े विचारहीन, कुतर्की, और रूढ़िग्रस्त लेखक थे और अपने लालित्यपूर्ण लेखन से उन्होंने प्रतिक्रियावादी विचारों को हिंदी के एक तबके का संस्कार बनाने में सफलता भी पाई. बहुत कुछ है लिखने को. मैं जानता हूं कि भक्त लोग विक्षुब्ध हो उठेंगे - पर पाश की यह पंक्ति ही दोहराऊंगा कि यदि सारा देश उसके शोक में शामिल है तो उस देश से मेरा नाम खारिज कर दो. यद्यपि मुझे उनके न होने का शोक है. पत्रकारिता में अब ऐसे लोग भी कहां बचे अब तो अपराधी और दलाल संपादकों के रूप में सभी नहीं तो कई जगह जरूर विराजमान हैं, पर यह इस बात का तर्क बिल्कुल नहीं बनना चाहिए कि हम व्यक्ति का झूठा महिमामंडन करें।
इस टीप के साथ उनका एक लेख मोहल्ला पर देखें।
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khub khari baat ki hai aape abhi main alok ji ki gazal ki kitaab aameen padh rahaa hun.... khub baat kahi hai unhone wahaan par bhi ....
arsh
अरे भाई अर्श साहब आमीन वाले आलोक दूसरे हैं
आलोक जी
इस आलेख के लिए एक बार पुनः बधाई. पाण्डे जी को भी.
चन्देल
आप से सहमत हुआ जा सकता है। लेकिन बिना प्रमाणों के इस तरह का लेखन निंदा की श्रेणी में नहीं आता क्या?
आपका लेख गाली के अलावा क्या है !
संभव हो तो लिखने की मर्यादा जैसी चीज
का भी ख्याल रखें | अगर प्रमाण रख
देते तो पाठक ( जिन्हें की आप नासमझ और
जाहिल मानते होंगे क्योंकि सब के सब
प्रभाषांध हैं[ ?] ) समझ लेते | आपका मंतव्य
भी पूरा हो जाता और गर्दभ-गाली-श्रधांजलि
देने की मस्सकत भी न करनी पड़ती | सीमाओं को
भी रखने का तरीका होता है ...खैर ........
क्षमा कीजियेगा ................
आलोक जी ने बेबाकी से अपनी बात रखी है, अच्छा लगा।
प्रमाण के लिये क्या-क्या बताया जाये भाई साहब?
सती प्रथा पर उनकी टिप्पणी, अभी रविवार वाले साक्षात्कार में ब्राह्मणवादी प्रवचन और भी क्या-क्या?
आलोक के लेख का मुहल्ला वाला लिंक देख लेते जो दस साल पुराना था। चाहें तो समयान्तर के पिछले अंक में रामशरण जोशी का लेख भी देख सकते हैं।
प्रभाषजी पर यह भावनात्मक नहीं बल्कि बेहद वैचारिक सूझ-बूझ के साथ लिखा गया लेख है। जहां असहमति हैं और जिनसे हैं उन्हें आना ही चाहिए।
हमारे यहाँ एक कहावत है ^mare हुए बैल की आखे भी बड़ी बड़ी होती हैं^ आलोक जी ने एक खतरा mool तो ले ही लिया है .... लेकिन मुझे लगता है ये जरुरी भी था हर रचनाकार का यह फर्ज बनता है की वो तस्वीर के dusare रुख को भी सामने रखे ख़ास toor पर तब जब हवा एक ही दिशा में बहने को आतुर हो .... लेख की bhashaa बहुत शालीन है .... आलोचनाओं और gali गलोच में फर्क होता है , पर इसे बहुत कम समर्थक समझ pate हैं. आलोक जी के साथ साथ mai अशोक bhai को भी बधाई देना चाहूँगा ki उन्होंने आलोचना करते हुए अपने प्रिय लोगों को भी नहीं बख्शा ..और अच्छा करने पर anjaan लोगों ki bhi खुले dil se तारीफ ki hai ..... इसीलिए उदय प्रकाश प्रकरण की कड़ी अल्पना जी तक भी जाती है ... nishchit roop se aalochna aho rupam aho swaram ka khel nahi hai
darasal ek ghatiya admi ka gungan batat gai ki kaisa waqt hai. sharmnak ye hai ki JALES ke naam se jaaree shok men prabhaash joshi jaise kattar brahmanwadi, manuwadi ko utkat wampanthee tak bata diya gaya hai. -dekhiyehttp://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2009/11/blog-post_4457.html
Is post ki sakht jarurat thi.
प्रभाषजी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे लोकतांत्रिक थे और अपनी अलोचना की चुनौती से घबराते नहीं थे अखबार में सारे पक्षों को बिना किसी भेद भाव के स्थान मिलना चाहिये जिसे वे देते थे
jansatta ke sampadak rup me prabhash joshi se achha kaun kar sakta tha, aor sampadak bana rah sakta tha. safal prakasakon ke bhi samajhote kam nahi hote.Alok ji ki tippdi seedhi rajanitik sakriyata magti hai ki INKLAB JINDABAD !!