बोधिसत्व की कुछ नयी कवितायें
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: कविता, बोधिसत्व | Posted On 13-9-09 at 1:22 am
चोर
मैं दूसरों की बनाई दुनिया में रहा
सड़के जिन पर मैं चला
चप्पलें जो मैंने पहनीं
रोटियाँ जो मैंने खाईं
सब थीं दूसरों की बनाईं ।
झंडे जो मैंने उठाए
नारे जो मैंने लगाए
गीत जो मैंने गाए
सब थे दूसरों के बनाए।
किताबें जौ मैंने पढ़ीं
थी सब दूसरों की गढ़ी।
मैं तो बस चोर की तरह
चुराता रहा दूसरों का किया
मैंने किया क्याजीवन जिया क्या ?
लालच
कुछ भी अच्छा देख कर ललच
उठता है मन
अच्छे घर अच्छे कपड़े
अच्छी टोपियाँ
कितनों चीजों के नाम लूँ
जो भी अच्छा देखता हूँ
पाने को मचल उठता हूँ।
यह अच्छी बात नहीं है जानता हूँ
यह बड़ी घटिया बात है मानता हूँ।
लेकिन कितनी बार मन में आता है
छीन लूँ
सब अच्छी चीजें पा लूँ कैसे भी।
अच्छी चीजें लुभाती हैं
सदा मुझे
मैं आपकी बात नहीं करता
शायद
आपका मन मर चुका है
शायद
आप का मन भर चुका है।
आप पा चुके वह सब जो पाना चाहते थे
नहीं रही अच्छी चीजों के लिए आपके मन में कोई जगह
कोई तड़प
कोई लालसा आपकी बाकी नहीं नही ।
लेकिन मेरी तृष्णा बुझी नहीं है अब तक
भुक्खड़ हूँ दरिद्र हूँ मैं जन्म का
हूक सी उठती है अच्छी चीजों को देख कर
हमेशा काम चलाऊ चीजें मिलीं
न अच्छा पहना
न अच्छा खाया
बस काम चलाया
तो अहक जाती नहीं
अच्छे को पाने के लिए सदा बेकल रहता हूँ।
हजार पीढ़ियाँ लार टपकाती मिट गई मेरी
इस धरती से
निकृष्ट चीजों से चलता रहा काम
अच्छी चीजें रहीं उनकी हथेलियों के बाहर
पकड़ से दूर रहा वह सब कुछ जो था बेहतर
वे दूर से निहारते सिधार गए
मैं नहीं जाना चाहता उनकी तरह अतृप्त छछाया
मैं खत्म करना चाहता हूँ लालच और अतृप्ति का यह खेल
इसीलिए मैं जो कुछ भी अच्छा है
उसे कैसे भी पाना चाहता हूँ
जिसे बुरा मानना हो माने
मैं लालची हूँ और सचमुच
सारी अच्छी चीजें हथियाना चाहता हूँ ।
बिटिया का कहना
जब घर से निकला था
खेल रही थी पानी से,
मुझे देख कर मुसकाई
हाथ हिलाया बेध्यानी से।
रात गए जब घर लौटा उसको
सोता पाया।
हो सकता है जगे जान कर
मुझको आया।
दिन में बात हुई थी
बहुत कुछ लाना था
सोते से जगा कर
सब कुछ दिखलाना था।
किंतु न लाया कुछ भी
सोचा ला दूँगा,
रोज-रोज की बात है कुछ भी
समझा दूँगा।
अभी जगी है पूछ रही है
आए पापा,
जो जो मैंने मँगवाया था
लाए पापा।
निकला हूँ कंधे पर उसको
बैठा कर
दिलाना ही होगा सब कुछ
दुकान पर ले जाकर।
यह हरजाना है
भरना ही होगा,
बिटिया जो भी कहे करना ही होगा।
ऐसा तो नहीं था
दिन भर खट कर सो रही है
बाल बिखरे हैं
चूड़ियाँ तितर-बितर हैं
हाथों पर बरतन मलने का निशान है
कुहनी पर लगा थोड़ा पिसान है,
नाखूनों पर कोई रंग नहीं है
पैरों में पड़ रही हैं बिवाइयाँ
माथे की बिंदी खिसक कर
बगल हो गई है
ऐसा लगता है
कुछ सोचते-सोचते सो गई है।
कुछ साल पहले
ऐसा न था
यही अंगुलियाँ होती थी कैसी
मूँगे कि टहनी जैसी
यही ललाट था स्वर्ण पट्टिका सा जगजगाता
यही करतल थे पद्म से सजे-धजे
यही चरणतल थे पल्लव से रक्तिम
यही नाखून थे दीप माला से कुंदन से
दिप-दिप करते
यही केश थे मह-मह लहराते नागफनी से
कुछ साल पहले ...... ऐसा न था
घर सँवारने में उलझ गई है ऐसे
कि अपने को सजाने का
ध्यान ही नहीं रह गया है
बदल गई है घर बसा कर इसकी दुनिया
सोई है खट कर दिन भर।
कल की बात
कल संझा की बात है
ऐसी ही एक बात है....
कुछ उलझन से भर कर
बैठा था बिल्डिंग की छत पर
कुछ सोच रहा था ऐसे ही,
मेरे बगल की बिल्डिंग की
दूसरे तल्ले की एक खिड़की
खुली हुई थी थोड़ी सी।
जूड़ा बाँधे एक लड़की
तलती थी कुछ चूल्हे पर
तलती थी कुछ गाती थी
गाती थी कुछ तलती थी
तभी पीछे से आकर
उसको बाहों में भर कर
बोला उससे कुछ सहचर।
पकड़-धकड़ में खुला जूड़ा
हाथ बढ़ा बुझा चूल्हा
चले गए दोनों भीतर
बैठा रहा मैं छत पर....
कल संझा की बात है...
ऐसी ही एक बात है...


अविनाश: चोर पढ़ कर लगा
हम सब चोर हैं
लालच पढ़ करहम सब लालची हैं
बिटिया का कहना
बिटिया है गहना
ऐसा तो नहीं था
पर ऐसा ही है
कल की बात
कल की बात रहे
avinash vachaspati, chat par
लालच कविता ने मानस का विस्तार किया...सचमुच ऐसी ही रचनाओं की जरूगत है.
सुमन केशरी