राजेश जोशी की कवितायें
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय | लेबल: कविता, राजेश जोशी | Posted On 2-9-09 at 10:22 am
(राजेश जोशी उस दौर के सबसे मुखर युवा कवियों में से हैं जिस दौर में हम विश्वविद्यालय में पढने के साथ लडना भी सीख रहे थे। ज़ाहिर है उनकी कवितायें उस पूरी प्रक्रिया में हमारी हमसफ़र थीं और आज भी है। यह सिलसिला टूटा तो अब भी नहीं है। यहां प्रस्तुत हैं उनकी कवितायें )
बच्चे काम पर जा रहे हैं
कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया हैं
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूल
पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए
बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।
माँ कहती है
हम हर रात पैर धोकर सोते है
करवट होकर।
छाती पर हाथ बाँधकर
चित्तहम कभी नहीं सोते।
सोने से पहलेमाँ
टुइयाँ के तकिये के नीचे
सरौता रख देती है
बिना नागा।
माँ कहती है डरावने सपने इससे
डर जाते है।
दिन-भर फिरकनी-सी खटती
माँ हमारे सपनों के लिए
कितनी चिन्तित है!
शासक होने की इच्छा
वहाँ एक पेड़ था
उस पर कुछ परिंदे रहते थे
पेड़ उनकी आदत बन चुका था
फिर एक दिन जब परिंदे आसमान नापकर लौटे
तो पेड़ वहाँ नहीं था
फिर एक दिन परिंदों को एक दरवाजा दिखा
परिंदे उस दरवाजे से आने-जाने लगे
फिर एक दिन परिंदों को एक मेज दिखी
परिंदे उस मेज पर बैठकर सुस्ताने लगे
फिर परिंदों को एक दिन एक कुर्सी दिखी
परिंदे कुर्सी पर बैठे
तो उन्हें तरह-तरह के दिवास्वप्न दिखने लगे
और एक दिन उनमें
शासक बनने की इच्छा जगने लगी !
भूलने की भाषा
पानी की भाषा में एक नदी
मेरे बहुत पास से गुज़री।
उड़ने की भाषा में बहुत से परिन्दे
अचानक फड़फड़ा कर उड़े
आकाश में बादलों से थोड़ा नीचे।
एक चित्र लिपि में लिखे पेड़ों पर
बहुत सारे पत्ते हिले एक साथ
पत्तों के हिलने में सरसराने की भाषा थी।
लगा जैसे तुम यहीं कहीं हो
देह की भाषा में अचानक कहीं से आती हुई।
भूलने की भाषा में
कुछ न भूले जा सकने वाले को
बुदबुदाती हुई।
बच्चे काम पर जा रहे हैं
कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया हैं
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूल
पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए
बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।
माँ कहती है
हम हर रात पैर धोकर सोते है
करवट होकर।
छाती पर हाथ बाँधकर
चित्तहम कभी नहीं सोते।
सोने से पहलेमाँ
टुइयाँ के तकिये के नीचे
सरौता रख देती है
बिना नागा।
माँ कहती है डरावने सपने इससे
डर जाते है।
दिन-भर फिरकनी-सी खटती
माँ हमारे सपनों के लिए
कितनी चिन्तित है!
शासक होने की इच्छा
वहाँ एक पेड़ था
उस पर कुछ परिंदे रहते थे
पेड़ उनकी आदत बन चुका था
फिर एक दिन जब परिंदे आसमान नापकर लौटे
तो पेड़ वहाँ नहीं था
फिर एक दिन परिंदों को एक दरवाजा दिखा
परिंदे उस दरवाजे से आने-जाने लगे
फिर एक दिन परिंदों को एक मेज दिखी
परिंदे उस मेज पर बैठकर सुस्ताने लगे
फिर परिंदों को एक दिन एक कुर्सी दिखी
परिंदे कुर्सी पर बैठे
तो उन्हें तरह-तरह के दिवास्वप्न दिखने लगे
और एक दिन उनमें
शासक बनने की इच्छा जगने लगी !
भूलने की भाषा
पानी की भाषा में एक नदी
मेरे बहुत पास से गुज़री।
उड़ने की भाषा में बहुत से परिन्दे
अचानक फड़फड़ा कर उड़े
आकाश में बादलों से थोड़ा नीचे।
एक चित्र लिपि में लिखे पेड़ों पर
बहुत सारे पत्ते हिले एक साथ
पत्तों के हिलने में सरसराने की भाषा थी।
लगा जैसे तुम यहीं कहीं हो
देह की भाषा में अचानक कहीं से आती हुई।
भूलने की भाषा में
कुछ न भूले जा सकने वाले को
बुदबुदाती हुई।


राजेश जी की कविताओं का क्या कहना ! मैं किस्मत वाली हूँ कि आकाशवाणी लखनऊ के सभाकक्ष में उनकी यह कविताएँ मैने रूबरू भी सुनी हैं. ब्लॉग पर इन्हे लाने के लिए धन्यवाद.
जोशी जी की बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता बड़े दिनो बाद फिर पढ़ने को मिली..धन्यवाद..्कुछ और कविताएं भी लाइये
राजेश जोशी की अद्भुत कविताओं को पढ़वाने का आभार.
हूं. देखे.
मुझे व्यक्तिगत तौर पर राजेश जोशी की कविताएं बहुत भाती है...