फिराक साहब

प्रस्तुतकर्ता Ashok Kumar Pandey | लेबल: | Posted On 22/12/10 at 7:35 am

छ्लक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं
निगाहे-नरगिसे-राना, तेरा जवाब नहीं

ज़मीन जाग रही है कि इन्क़लाब है कल
वो रात है कि कोई ज़र्रा भी महवे-ख़्वाब नहीं

ज़मीन उसकी, फ़लक उसका, कायनात उसकी
कुछ ऐसा इश्क़ तेरा ख़ानमा ख़राब नहीं

जो तेरे दर्द से महरूम हैं यहाँ उनको
ग़मे- ज़हाँ भी सुना है कि दस्तयाब नहीं

अभी कुछ और हो इन्सान का लहू पानी
अभी हयात के चेहरे पे आबो-ताब नहीं

दिखा तो देती है बेहतर हयात के सपने
ख़राब हो के भी ये ज़िन्दगी ख़राब नहीं